मकर संक्रांति: आस्था, दान और प्रकृति के नूतन विहान का महापर्व— डॉ. अखिलेश चन्द्र चमोला
हमारा भारतवर्ष केवल एक भौगोलिक भू-भाग नहीं, बल्कि त्योहारों, उत्सवों और जीवंत परंपराओं का एक शाश्वत राष्ट्र है। यहाँ हर प्रांत की माटी से संस्कृति की अलग सुगंध आती है, और यहाँ मनाया जाने वाला हर पर्व किसी न किसी गहरे धार्मिक और वैज्ञानिक चिंतन से जुड़ा होता है। ‘मकर संक्रांति’ भारतीय संस्कृति का एक ऐसा ही अनूठा पर्व है, जो प्रकृति, परमात्मा और मानवता के सुंदर समन्वय का प्रतीक है।

देवताओं का प्रभात काल: उत्तरायण
पौष मास की समाप्ति और माघ मास के आगमन पर, जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब मकर संक्रांति का पावन पर्व मनाया जाता है। शास्त्रों में सूर्य की दो स्थितियों का वर्णन है—उत्तरायण और दक्षिणायन। उत्तरायण को ‘देवताओं का दिन’ और दक्षिणायन को ‘देवताओं की रात्रि’ माना गया है। मकर संक्रांति वह पुण्य बेला है, जब देवताओं का प्रभात होता है। यह अंधकार से प्रकाश की ओर (तमसो मा ज्योतिर्गमय) जाने का पर्व है।
इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, जप, तप, श्राद्ध और अनुष्ठान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस पावन तिथि पर किया गया दान अक्षय होता है और उसका सौ गुना फल प्राप्त होता है।
सूर्य और शनि का मिलन
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह पर्व पिता और पुत्र के मिलन का भी उत्सव है। सूर्य देव जब अपने पुत्र शनि की राशि (मकर) में प्रवेश करते हैं, तो यह मकर संक्रांति कहलाती है। यह मिलन हमें सिखाता है कि मतभेद भुलाकर प्रेम और सौहार्द के साथ रहना ही जीवन का सार है।
अनेकता में एकता का प्रतीक
यह पर्व भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में भिन्न-भिन्न नामों और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। पंजाब में इसे ‘लोहड़ी’ के उल्लास के रूप में, दक्षिण भारत में ‘पोंगल’ की मिठास के रूप में, और गुजरात में ‘उत्तरायण’ (पतंग उत्सव) के रूप में मनाया जाता है। वहीं, देवभूमि उत्तराखंड में इसे मुख्य रूप से ‘मकरैणी’ और ‘खिचड़ी संक्रांति’ के नाम से जाना जाता है।
देवभूमि की परंपरा: घुघती त्यार
उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊं मंडल में, इस पर्व का एक अलग ही सौंदर्य है। यहाँ इसे ‘घुघती त्यार’ के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन आटे और गुड़ से ‘घुघते’ (एक प्रकार का पकवान) बनाए जाते हैं। यह पर्व पारिवारिक रिश्तों की गर्माहट का भी प्रतीक है, जहाँ विशेष रूप से बेटियों को घुघती भेंट स्वरूप दी जाती है। बच्चे “काले कौवा काले, घुघती माला खा ले” कहते हुए कौवों को बुलाते हैं, जो प्रकृति और मनुष्य के सह-अस्तित्व का एक अनुपम उदाहरण है।
दान का महात्म्य: घृत और कम्बल
मकर संक्रांति पर दान की महिमा अपरंपार है। विशेष रूप से घृत (घी) और कम्बल के दान का शास्त्रों में बहुत महत्व बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन इन वस्तुओं का दान करने वाला व्यक्ति जीवन के सम्पूर्ण भोगों को भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। यह पर्व हमें अपनी कमाई का कुछ हिस्सा समाज के वंचित वर्ग को देने की प्रेरणा देता है।
इस वर्ष का दुर्लभ संयोग (2026)
इस वर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व अत्यंत विशेष और फलदायी है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, 23 वर्षों के बाद ग्रहों का एक दुर्लभ और प्रभावकारी संयोग बन रहा है। इस बार मकर संक्रांति पर ‘पुण्य काल’ और ‘महापुण्य काल’ के साथ-साथ ‘एकादशी’ (परतिला/षटतिला) का संयोग भी है।
सबसे विशेष बात यह है कि इस दिन ‘अनुराधा नक्षत्र’ पूरे दिन रहेगा। अनुराधा नक्षत्र मित्रता, भक्ति और समृद्धि का कारक है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश और साथ में एकादशी व अनुराधा नक्षत्र का होना, इस दिन को साधना और सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ बनाता है।
मकर संक्रांति केवल ऋतु परिवर्तन का सूचक नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन में नई ऊर्जा, नई आशा और नए संकल्पों के उदय का पर्व है। आइए, इस पुण्य अवसर पर हम न केवल सरोवरों में स्नान करें, बल्कि अपने मन के विकारों को भी धो डालें और स्नेह व सहयोग का दान देकर मानवता को समृद्ध करें।

