साईं सृजन पटल मासिक पत्रिका का अभिनव प्रयोग : गढ़वाली भाषा को समर्पित एक विशेष पृष्ठ

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(गढ़वाली भाषा का संरक्षण और संवर्धन: साईं सृजन पटल का ऐतिहासिक पहल)

डोईवाला : हमारे देश की सांस्कृतिक धरोहर में प्रत्येक भाषा और बोली का विशेष स्थान है। उत्तराखंड की पहचान और उसका गौरवपूर्ण इतिहास गढ़वाली भाषा के माध्यम से जीवित है। इस भाषा ने न केवल हमारे क्षेत्रीय जीवन को समृद्ध किया है, बल्कि इसकी गहरी जड़ों में हमारी परंपराएँ, लोककला और सांस्कृतिक धरोहर भी समाहित हैं। इस संदर्भ में, साईं सृजन पटल मासिक पत्रिका ने एक सराहनीय कदम उठाया है जो न केवल गढ़वाली भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा, बल्कि यह हमारे सांस्कृतिक जीवन के लिए भी एक समृद्धि का प्रतीक बनेगा।

प्रो. (डॉ.) के. एल. तलवाड़, संस्थापक , साईं सृजन पटल👇

एक विशेष पृष्ठ का आरक्षण: गढ़वाली भाषा का उज्ज्वल भविष्य

साईं सृजन पटल के संस्थापक प्रो. (डॉ.) के.एल.तलवाड़ ने कहा कि पटल ने अपनी मासिक पत्रिका में गढ़वाली भाषा के लिए एक विशिष्ट पृष्ठ आरक्षित करने का निर्णय लिया है। यह पहल गढ़वाली भाषा की महत्ता को उजागर करने के साथ-साथ इसके माध्यम से उत्तराखंड की संस्कृति, साहित्य और परंपराओं को भी न केवल संजोएगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक इस अमूल्य धरोहर को पहुँचाने का कार्य करेगी। इस विशेष पृष्ठ का उद्देश्य गढ़वाली साहित्य, कविता, लोककहानियाँ, लोकगीत, नाटक, लोककला, और विभिन्न सांस्कृतिक पहलुओं को समर्पित करना है, जो गढ़वाली भाषा की सशक्त पहचान को एक नया आयाम देंगे।

सांस्कृतिक समृद्धि और स्थानीय पहचान की ओर एक अहम कदम

पटल से जुड़े हिंदी शोधार्थी अंकित तिवारी ने कहा कि साईं सृजन पटल का यह विशेष पृष्ठ गढ़वाली भाषा के माध्यम से न केवल हमारे गौरवमयी अतीत को पुनः जीवित करने का प्रयास करेगा, बल्कि यह आज की नई पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बनेगा। इस पृष्ठ में गढ़वाली साहित्य के समृद्ध उदाहरणों को प्रस्तुत किया जाएगा, जो न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गढ़वाली संस्कृति और साहित्य को पहचान दिलाएंगे। इसके माध्यम से, गढ़वाली भाषा को अपनी पहचान बनाने का एक सुनहरा अवसर मिलेगा और साथ ही, इसके संरक्षण के लिए एक ठोस कदम उठाया जाएगा।

इस पहल का उद्देश्य और भविष्य

साईं सृजन पटल का यह कदम गढ़वाली भाषा के भविष्य को सुनिश्चित करने के साथ-साथ इसे राष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास है। इसके तहत, यह पत्रिका गढ़वाली भाषा के माध्यम से साहित्य, संगीत, कला, और संस्कृति के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ेगी। यह पृष्ठ न केवल गढ़वाली समुदाय को अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व महसूस कराएगा, बल्कि इसे अन्य भाषाओं और संस्कृतियों के साथ भी जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बनेगा।

इस पहल के माध्यम से, साईं सृजन पटल गढ़वाली भाषा को केवल संरक्षित नहीं करेगा, बल्कि इसे जीवित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का कार्य करेगा। इस प्रकार, गढ़वाली भाषा का संरक्षण केवल एक भाषा के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में किया जाएगा, जो आने वाले समय में हमारे समाज और राष्ट्र के लिए एक अमूल्य धरोहर बनकर उभरेगा।

साईं सृजन पटल का यह महत्वपूर्ण कदम गढ़वाली बोलने वाले समुदाय को अपनी पहचान और भाषा को संरक्षित रखने में मदद करेगा, और इसके माध्यम से हम अपने सांस्कृतिक गौरव को पुनः स्थापित कर सकेंगे।

अंकित तिवारी, हिंदी शोधार्थी👆


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