उत्तराखंड में कहीं शव यात्रा तो कहीं पद यात्रा — आखिर कौन जिम्मेदार?

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हम लिखते हैं — निष्पक्ष सच तक

उत्तराखंड संचार ब्यूरो


जनता का दर्द सड़कों पर उतर आया

उत्तराखंड—देवभूमि कहलाने वाला यह शांत पहाड़ी प्रदेश इन दिनों आंदोलनों की गूंज से भर उठा है। कभी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर शव यात्रा, तो कभी जनसमस्याओं के समाधान के लिए पद यात्रा — जनता अब सवालों का जवाब चाहती है।

घनसाली से लेकर गढ़वाल, कुमाऊँ और राजधानी देहरादून तक, हर ओर असंतोष की लहर है। कभी मरीजों की लाचारगी पर अस्पतालों की हालत को लेकर विरोध होता है, तो कभी बेरोज़गारी, सड़क, शिक्षा और पेयजल जैसी बुनियादी समस्याओं पर आक्रोश फूटता है।

घनसाली की “शवदाह यात्रा” बनी प्रतीक

हाल ही में टिहरी जनपद के घनसाली में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली के विरोध में सर्वदलीय स्वास्थ्य संघर्ष समिति ने एक अनोखा कदम उठाया — प्रतीकात्मक “शवदाह यात्रा”।
स्थानीय लोगों ने कहा, “जब अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, दवाएं नहीं, तो लोगों की मौतों का जिम्मेदार कौन?”

घनसाली बाजार से श्मशान घाट तक निकली इस यात्रा ने शासन-प्रशासन को झकझोर दिया। लोगों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि अब प्रतीक्षा नहीं — जवाब चाहिए।

दूसरी ओर, “पद यात्रा” बन रही आंदोलन की नई भाषा

जहाँ एक ओर किसी कस्बे में शव यात्रा निकाली जा रही है, वहीं दूसरी ओर पद यात्रा निकल रही है वो भी पूरे दस दिन की

चौखुटिया के निवासियों ने मांग की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए देहरादून की ओर 10-दिन की पदयात्रा शुरू की

उत्तराखंड के चौखुटिया में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के खिलाफ स्थानीय लोग सड़कों पर उतर आए हैं। सालों से बेहतर इलाज न मिलने से परेशान चौखुटिया के करीब दो दर्जन ग्रामीण, रिटायर्ड आर्मी जवान भुवन कठैत के नेतृत्व में देहरादून के लिए 300 किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकल पड़े हैं। उनकी मांग है कि दूरदराज के इस पहाड़ी इलाके में स्वास्थ्य सेवाओं में तुरंत सुधार किया जाए। यह विरोध प्रदर्शन कई हफ्तों से चल रहा था और शुक्रवार को यह तब और तेज हो गया जब ग्रामीणों ने यह लंबी यात्रा शुरू की। वे मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री के आवास के बाहर धरना देने की चेतावनी दे रहे हैं, अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं।
भुवन कठैत ने कहा, “हम सिर्फ चौखुटिया के लिए नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ी क्षेत्र के लिए मार्च कर रहे हैं। यह यात्रा सरकार को जगाने के लिए है ताकि हर पहाड़ी निवासी को स्वास्थ्य का अधिकार मिल सके।”

यह आंदोलन 2 अक्टूबर को शुरू हुआ था, जब स्थानीय लोग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) के बाहर भूख हड़ताल पर बैठे थे। उनकी मुख्य मांगें हैं कि CHC में एक स्त्री रोग विशेषज्ञ (gynecologist) और एक बाल रोग विशेषज्ञ (pediatrician) की नियुक्ति की जाए। साथ ही, अस्पताल में आधुनिक जांच उपकरण (diagnostic equipment) भी लगाए जाएं। ग्रामीणों का कहना है कि प्रसव जैसी आपातकालीन स्थिति में भी उन्हें इलाज के लिए कई किलोमीटर दूर रानीखेत या हल्द्वानी जाना पड़ता है। इस देरी के कारण कई गर्भवती महिलाओं ने अपने अजन्मे बच्चों को खो दिया है।
स्थानीय निवासी हेम कंडपाल ने कहा कि अगर ग्रीष्मकालीन राजधानी (summer capital) पूरी तरह से चालू होती तो पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाएं शायद बेहतर हो जातीं। उन्होंने बताया, “डॉक्टर यहां आने में हिचकिचाते हैं। हालांकि सरकार ने हाल ही में दो डॉक्टरों को तैनात करने का आदेश दिया था, लेकिन उनमें से कोई भी नहीं आया। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (chief medical officer) ने भी इसकी पुष्टि की है, और अब अल्मोड़ा से दो डॉक्टरों को एक महीने के लिए अस्थायी रूप से तैनात किया गया है।”

इस बीच, प्रशासनिक अधिकारी चौखुटिया पहुंचे और प्रदर्शनकारियों से अपना विरोध प्रदर्शन समाप्त करने का आग्रह किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि मामले को वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचा दिया गया है। हालांकि, ग्रामीण आश्वस्त नहीं थे। एक निवासी, चंद्र कोहली ने कहा, “हम सालों से वादे सुन रहे हैं, लेकिन जमीन पर कुछ भी नहीं बदला है।” उन्होंने आगे कहा, “अगर कोई बीमार पड़ता है, तो हमें इलाज के लिए 60 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। हमारा धैर्य जवाब दे गया है।”

सरकार और व्यवस्था के प्रति बढ़ता अविश्वास

राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने की दहलीज पर खड़ा उत्तराखंड, आज भी बुनियादी सेवाओं के लिए आंदोलनों पर निर्भर है।
ग्रामीण स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और रोज़गार जैसी प्राथमिक ज़रूरतें अब भी अधूरी हैं।
लोगों का कहना है कि “नीतियाँ तो बनती हैं, पर ज़मीन पर असर नहीं दिखता।”

वहीं प्रशासन का तर्क है कि “संसाधनों की कमी और भौगोलिक कठिनाइयों के बावजूद सुधार जारी है।”
मगर सवाल यही उठता है — कब तक?

जन आंदोलन बनाम सत्ता की संवेदनहीनता

राज्य की सड़कों पर उतरती ये शव यात्राएँ और पद यात्राएँ केवल प्रतीक नहीं हैं, बल्कि जनता के धैर्य की अंतिम सीमा का संकेत हैं।
जनता अब आश्वासनों से नहीं, परिणामों से न्याय चाहती है।

सवाल यही है —
क्या सत्ता अब भी इन आवाज़ों को “राजनीतिक प्रदर्शन” मानकर अनसुना करेगी?
या फिर इन यात्राओं को एक चेतावनी की तरह लेकर नीतिगत सुधार की दिशा में कदम बढ़ाएगी?

✍️निष्कर्ष

उत्तराखंड में शव यात्रा हो या पद यात्रा —
दोनों जनता के भीतर पनप रहे असंतोष की अभिव्यक्ति हैं।
यह प्रदेश अपने नागरिकों से सिर्फ धैर्य नहीं, अब समाधान की अपेक्षा करता है।

क्योंकि अंततः सवाल वही है —
“आख़िर कौन है जिम्मेदार?”

“भ्रष्ट नेता या भेंड़चाल जनता “


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